हर साल हम बसंत पंचमी के मौक़े पर देश भर मे सरस्वती पूजा बहुत हर्ष उल्लास पूर्वक मनाते है, खास कर कलाकारों और छात्रों के बीच सरस्वती पूजा का विशेष महत्व देखा जाता है, वैसे हमारे पौराणिक ग्रंथों में सरस्वती पूजा को लेकर कई तरह की कहानिया है लेकिन आज हम बात करेंगे |

किस प्रकार ब्रम्हा जी ने माँ सरस्वती की उत्पत्ति की –
ब्रम्हा जी ने जब पूरी श्रृष्टि की रचना की, तब उन्हें सब कुछ काफी सुना और शांत लग रहा था उन्हें महसूस हुआ कि यहा कुछ तो कमी है, इसके बाद उन्होंने अपने कमंडल से जल निकाला और छिड़क दिया जिससे वहां माँ सरस्वती प्रकट हुयी ,उन्होंने अपने हाथो में वीणा, माला और पुस्तक धारण की हुयी थी और ब्रम्हा जी ने माँ सरस्वती की परीक्षा लेनी चाही ,उन्होंने सरस्वती जी से ये कहा था कि आप वीणा बजाए ,जब सरस्वती जी ने अपने वीणा से वसंत राग छेड़ा तो ब्रह्मा की हर चीज़ में आवाज गई श्रृष्टि को वाणी और संगीत की प्राप्ति हो गई और पूरा ब्रह्मांड काफी खुशनुमा और जिवंत सा हो गया कहा जाता है दोस्तों की उस तिथि को माघ शुक्ल पंचमी थी और इस वजह से हर साल बसंत पंचमी मनाई जाने लगी

इस दिन माँ सरस्वती के आगमन को लेकर खुशी मनाने के साथ साथ उनकी पूजा अर्चना भी करते है इस दौरान पूरे देश मे विद्यार्थि और कला प्रेमी उनकी प्रतिमा स्थापित करके उनकी उपासना करते दिखाई देते है सनातन धर्म मे माँ सरस्वती को विधा और बुद्धि की देवी माना जाता है इसीलिए माँ सरस्वती की गुरुवार के दिन विशेष पूजा की जाती है जिस प्रकार भगवान शंकर का सवारी नंदी ,विष्णु जी का गरुड़ है कार्तिकेय भगवान का मोर, माँ दुर्गा का सिंह, और श्री गणेश जी का चूहा है उसी प्रकार माँ सरस्वती का वाहन हंस है |
अखिर हंस ही माँ सरस्वती का वाहन क्यूँ है ?
सबसे पहले इस बात को समझना होगा कि वाहन मतलब ये नहीं है कि उस पर बैठ कर सवारी करनी है ब्लकि ये एक प्रतीक के तौर पर दिखाया जाता है जिसके कुछ गहरे अर्थ होते है, हंस को बुद्धि का प्रतीक माना जाता है एक कहावत है कि हंस दूध का दूध और पानी का पानी कर देता है ऐसा करने की क्षमता हंस मे होती भी है जो उसके विवेक को दर्शाता है,

इसके अलावा जो आप देखेंगे कि माँ सरस्वती का वाहन जो हंस है वो सफेद होता है और ये रंग पवित्रता और शांति का प्रतीक माना जाता है शिक्षा हासिल करने के लिए पवित्रता बेहद जरूरी माना जाता है, पवित्रता से ही श्रद्धा और एकाग्रता आती है जिससे इंसान शिक्षा हासिल कर अपने ग्यान को बड़ा सकता है और ग्यान से ही हमे सही और गलत, शुद्ध और अशुद्ध की पहचान होती है यही विवेक कहलाता है |
ग्रंथो में माँ सरस्वती को वीणा बजाते हुए एक सुन्दर स्त्री के रूप मे प्रस्तुत किया गया है –
एक कहानी के मुताबिक माँ सरस्वती के सुन्दरता पर उनको पैदा करने वाले यानी ब्रम्हा जी खुद मोहित हो गए थे और वो उन्हें अपनी पत्नी बनाना चाहते थे लेकिन माँ सरस्वती उनसे विवाह ही नहीं करना चाहती क्युकी ब्रम्हा जी ने सदैव उनकी रचना की थी और इस तरह से उनके लिए वो पिता तुल्य थे ऐसे मे ब्रम्हा जी की दृष्टि से बचने के लिए सरस्वती जी ने चारो दिशाओं में छुपने का बहुत प्रयास किया लेकिन वो सफल नहीं हो पायी, वो स्वर्ग जा कर छुपी तो ब्रम्हा जी वहां भी आ गए, आखिर मे उन्हें ब्रम्हा जी से सादी करनी ही पडी,
सरस्वती पुराण की माने तो ब्रम्हा और सरस्वती जी 100 वर्षों तक जंगल में पति पत्नी के रूप मे रहे और इस दौरान दोनों के बीच खूब प्रेम भी बना रहा, कहा जाता है कि दोनों के मिलन से एक पुत्र भी हुआ था जिसे स्वयंभू मनु के नाम से जाना जाता है
वही कुछ अन्य कथाओं के अनुसार ब्रम्हा जी को अपनी पुत्री तुल्य सरस्वती जी से विवाह करने के लिए देवताओं से काफी आलोचना भी सहनी पडी सभी देवता इसे गलत व्यवहार मानते हुए भगवान शिव के पास जाते है और उन्हें ब्रम्हा जी को सजा देने का निवेदन करते है अब ये सब सुनकर भगवान शिव काफी ज्यादा क्रोधित हुए और उन्होंने ब्रम्हा जी के पांचवे शिर को धड़ से अलग कर दिया जिसके द्वारा ब्रम्हा जी की नजर सरस्वती जी पर पडी इसके साथ भी भगवान शिव ने उनको श्राप भी दिया कि उनकी धरती पर कहीं भी पूजा नहीं होगी यही वजह है कि ब्रम्हा जी की पूजा किसी अन्य भगवान या देवताओं की तरह देखी नहीं जाती है,

वही कुछ ग्रंथो मे ये उल्लेख मिलता है कि ब्रम्हा जी के पत्नी और पुत्री दोनों का नाम सरस्वती था जिसकी वजह से ये भ्रम उत्पन्न हुआ पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक ब्रम्हा की पुत्री और विद्या की देवी सरस्वती अलग है और उनकी पत्नी सरस्वती अलग है, कहा जाता है कि सरस्वती एक शब्द है जिसका उपयोग उसके लिए किया जाता है जो ज्ञान और विद्या के लिए पूजी जाए जिसका साकार रूप हो उस ऊर्जा शक्ति के लिए सरस्वती शब्द का प्रयोग किया जाता है शास्त्रों के अनुसार जिस प्रकार ज्ञान और विद्या दो है उसी प्रकार सरस्वती भी दो है |
विद्या में अपरा और परा विद्या है अपरा विद्या की श्रृष्टि ब्रम्हा जी से हुयी है जो उनकी पुत्री है और ज्ञान को प्रदर्शित करती है वही परा विद्या को प्रदर्शित करने वाली सरस्वती महालक्ष्मी की पुत्री है जो ब्रम्हा जी की पत्नी है मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करने वाली है
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